फतेहाबाद:हाथों में कांपती हुई लकड़ी का सहारा, थके हुए कदम और 60 किलोमीटर बस के धक्कों का दर्द लिए जब एक बेबस दिव्यांग कुछ दिनों पहले बुजुर्ग फतेहाबाद पुलिस अधीक्षक (एसपी) के दफ्तर पहुंचे, तो शायद उन्हें खुद अंदाजा नहीं था कि उनकी यह लाचारी जिले के दशकों पुराने पुलिसिया ढर्रे को हमेशा के लिए बदल देगी।
बुजुर्ग को लड़खड़ाते देख फतेहाबाद की एसपी निकिता खट्टर खुद अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुईं। उन्होंने बुजुर्ग को ससम्मान बैठाया और पानी पूछकर बेहद नम्रता से पूछा—”बताये, क्या बात है?”
बुजुर्ग ने भरभराई और कांपती आवाज में अपना दर्द बयां किया, “मैडम, टोहाना थाने में लड़ाई-झगड़े की शिकायत दी थी, पर कोई सुनता ही नहीं। 60 किमी दूर से जैसे-तैसे धक्के खाकर आपके पास आया हूं। इस उम्र और लाचारी में बार-बार इतनी दूर आना मेरे बस का नहीं, कुछ समाधान जरूर कर देना।”
एक फरियाद ने झकझोर दिया कप्तान का दिल
बुजुर्ग का यह दर्द और सफर की बेबसी आईपीएस निकिता खट्टर के दिल को छू गई। उन्होंने मौके पर ही बुजुर्ग को न्याय का भरोसा दिलाया और उसी क्षण एक ऐतिहासिक फैसला लिया—अब टोहाना की जनता को 60 किमी का सफर तय करके एसपी के पास नहीं आना पड़ेगा, बल्कि खुद कप्तान जनता की चौखट पर जाएंगी।
इसी संवेदनशील सोच के चलते अब हर गुरुवार को टोहाना में जिले का अस्थायी एसपी कार्यालय सजता है। कप्तान निकिता खट्टर खुद मौके पर बैठकर लोगों की फरियाद सुनती हैं और फाइलों को लटकाने के बजाय तुरंत मौके पर ही निपटारे के सख्त निर्देश देती हैं।
:लापरवाह पुलिसकर्मियों में खौफ, व्यवस्था पर कसी नकेल::
एसपी की इस अनोखी और संवेदनशील पहल से टोहाना के थानों और चौकियों का मिजाज पूरी तरह बदल गया है। समाज के प्रबुद्ध नागरिकों—स्वास्थ्य मित्र संगठन के अजायब सिंह, समाजसेवी विक्रम प्रभाकर, डॉ. शिव सचदेवा, समाजसेवी राजकुमार सरदाना और पूर्व विधायक हनुमान बिश्नोई के बेटे मनोज बिश्नोई का कहना है कि जो पुलिसकर्मी पहले शिकायतों को महीनों तक दबाए रखते थे, वे अब एसपी की सीधी मौजूदगी के डर से पूरी तरह अलर्ट मोड पर आ गए हैं। थानों में बरसों से चल रही सुस्ती अब चुस्ती में बदल चुकी है।
सेवा, सुरक्षा और सहयोग’ केवल नारा नहीं, जमीनी हकीकत बने
एसपी निकिता खट्टर का कहना है:
“पुलिस का मुख्य उद्देश्य केवल अपराध रोकना ही नहीं, बल्कि आमजन को बिना परेशानी के न्याय दिलाना है। टोहाना से आने वाले शिकायतकर्ता पहले से ही अपनी समस्या से मानसिक तनाव में होते हैं, उस पर 60 किमी का थकाऊ सफर उनकी पीड़ा और बढ़ा देता था। इसी परेशानी को देखते हुए हमने हफ्ते में एक दिन टोहाना में ही बैठकर जनसमस्याएं सुनने का फैसला किया।”
::जिले में यूं तो कई पुलिस अधीक्षक आए और चले गए, लेकिन एक दिव्यांग बुजुर्ग के दर्द पर फौरन मरहम रखकर पूरी व्यवस्था को जनता के अनुकूल मोड़ देने वाली निकिता खट्टर की यह पहल आज पूरे इलाके में मिसाल बन चुकी है।





