फतेहाबाद: राजनीति में ‘सेवा’ के नाम पर ‘मेवा’ खाने की कला में हमारे शहर में इन दिनों माननीय युवा नेता जी ने डॉक्टरेट कर ली है। आजकल गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि नेता जी अचानक ‘नशा मुक्ति’ के इतने बड़े पैरोकार कैसे बन गए? लेकिन अगर उनके करीबियों की मानें, तो यह कोई हृदय परिवर्तन नहीं, बल्कि सरकारी तिजोरी तक पहुँचने का एक नया ‘जुगाड़’ है।
सूत्रों की मानें तो यह सारा खेल तब शुरू हुआ जब अनुराग ठाकुर केंद्रीय मंत्री हुआ करते थे। नेता जी जब भी उनसे मिलते तो बस एक ही रट लगाए रहते थे— “साहब, सरकार से कुछ रुपयों का इंतजाम करवा दो!” मगर उन्हें दो टूक जवाब मिला। उन्हें समझाया गया कि अगर फंड चाहिए, तो सिस्टम से आना होगा:
पहले एक संस्था (NGO) बनाइए।
फिर ‘नशा मुक्ति’ जैसे किसी गंभीर मुद्दे पर काम शुरू कीजिए और फिर सरकार उस प्रोजेक्ट बनाकर दे देगी और तब कहीं जाकर सरकारी ग्रांट का रास्ता खुलेगा।
चंडीगढ़ के चक्कर और ‘कागजी’ समाज सेवा
इतना सुनते ही नेता जी से रहा नही गया और बस, फिर क्या था! ‘नशे’ से नेता जी को अचानक इतनी नफरत हो गई कि उन्होंने तुरंत कागजों पर समाज सेवा का चोला ओढ़ लिया। खबर है कि इसी ग्रांट के जुगाड़ में नेता जी पिछले कुछ समय से चंडीगढ़ की दौड़ लगा चुके हैं।
अंदर की बात: इनके साथ रहने वालों की माने तो जनता सोच रही है कि नेता जी नशे के खिलाफ अभियान चला रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि नेता जी को ‘सरकारी फंड’ लेने का नशा चढ़ गया है। अब देखना यह है कि क्या प्रदेश सरकार का खजाना इन ‘नकली समाजसेवियों’ के लिए खुलता है या यह फाइल भी ठंडे बस्ते में चली जाती है।






